सोमवार, 4 अप्रैल 2016

डॉ. उर्मिलेश: भूल गये





वो घटायें, वो फुहारें, वो छनक भूल गये,
बच्चे बारिश में नहाने की ललक भूल गये।

ओस कुछ ऐसी पड़ी अबके बरस धरती पर,
लॉन के फूल भी सब अपनी महक भूल गये।

इस कदर प्लास्टिक हावी हुई अपने घर में,
कान, बरसों हुए चूड़ी की खनक भूल गये।

जब से इस बाग में पश्चिम की हवा चल निकली,
तबसे पंछी भी यहाँ अपनी चहक भूल गये।

गाँव के होते हुए जिसको शहर जाना था,
देश के रहनुमा वो ही सड़क भूल गये।

मरकरी बल्बों ने कुछ ऐसा हमें भरमाया,
अब तो हम चाँद-सितारों की चमक भूल गये।

मेरे होंठों की हँसी सबने यहाँ याद रखी,
जाने क्यों लोग मेरे दिल की कसक भूल गये।
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