बुधवार, 12 जुलाई 2017

पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज': ऐसे माहौल में



अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाय
जिसमें इन्सान को इन्सान बनाया जाये।

जिसकी ख़ुशबू से महक़ जाये पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हरसिम्त खिलाया जाये।

आग बहती है यहाँ गँगा में झेलम में भी
कोई बतलाये कहाँ जा के नहाया जाये।

 प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अन्धेरे को उजाले में बुलाया जाये।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाये।

ज़िस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाये।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाये।
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