रविवार, 8 फ़रवरी 2015

अर्ज़ किया है- 11



गौहर अस्मानी-
कभी शऊर कभी दिल कभी सुखन महके 
वो बात कहिए कि दुनियाए-फिक्रोफन महके.
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बशीर बद्र-
इक अस्पताल में कल मैंने बेच दी आँखें 
दहेज लाना जरूरी था बेटियों के लिए.
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निदा फ़ाज़ली-
धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो 
ज़िन्दगी क्या है क़िताबों को हटाकर देखो.
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आर.डी. शर्मा 'तासीर'-
वो मिरा दोस्त है तासीर यही काफी है 
उसमें क्या बात है इस बारे में सोचा ही नहीं.
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बशीर बदर-
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं 
उमरें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में.
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बशीर बद्र-
कई लोग आग के फूल हैं, जरा दूर हों तो चमन-चमन 
जहां मुस्कुरा के गले लगे, दिलो-जां में आग लगा गए.
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मज़रूह सुल्तानपुरी-
बचा लिया मुझे तूफां की मौज़ ने वर्ना 
किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते.
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मज़रूह सुल्तानपुरी-
शबे-इन्तज़ार की कश्मकश में न पूछो कैसे सहर हुई 
कभी एक चराग बुझा दिया कभी एक चराग जला दिया.
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आर.डी. शर्मा 'तासीर'-
जीत पर खुश होने वाले ये भी देख 
ख़ून किसका है तेरी तलवार पर.
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आर.डी. शर्मा 'तासीर'-
याद कोई चोट को करता नहीं 
जख्म जिल्लत का मगर भरता नहीं.
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