बुधवार, 12 जुलाई 2017

पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज': ऐसे माहौल में



अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाय
जिसमें इन्सान को इन्सान बनाया जाये।

जिसकी ख़ुशबू से महक़ जाये पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हरसिम्त खिलाया जाये।

आग बहती है यहाँ गँगा में झेलम में भी
कोई बतलाये कहाँ जा के नहाया जाये।

 प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अन्धेरे को उजाले में बुलाया जाये।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाये।

ज़िस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाये।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाये।
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रविवार, 9 जुलाई 2017

हम तो वही हैं: पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'



करने चले थे होम मगर हाथ जल गये
हम यूं हंसे कि आंख से आंसू निकल गये।


दिखते हैं सबसे पीछे यहां आज वो ही लोग
मरने के दिन जो मौत से आगे निकल गये।

वो दिन जो ज़िन्दगी के गुजारे तेरे बग़ैर
कुछ अश्क बन गये तो कुछ गीतों में ढल गये।

दैरो-हरम की राह में जो लड़खड़ाये पांव
आये वो मयक़दे में तो ख़ुद ही संभल गये।

है इश्क़ जिसका नाम वो कि ऐसी आग है
जो भी बुझाने आये इसे वो ख़ुद ही जल गये।

आयेगी कल बहार इसी एक आस में
टूटे हुए घिरौंदों से भी हम बहल गये।

इस कारवाने-क़ौम की इतनी है दास्तां
रस्ते वही हैं सिर्फ़ मुसाफिर बदल गये।

नीरज का हाल कोई जो पूछे तो बताइयो
हम तो वही हैं आज भी पर वो बदल गये।
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शनिवार, 13 मई 2017

पद्मश्री गोपाल दास 'नीरज'_नीरज का पता




आदमी ख़ुद को कभी यूँ ही सजा देता है
रोशनी के लिए शोलों को हवा देता है।

ख़ून के दाग़ हैं दामन पे जहाँ सन्तों के
तू वहाँ कौन से 'नानक' को सदा देता है।

एक ऐसा भी वो तीरथ है मेरी धरती पर
क़ातिलों को जहाँ मन्दिर भी दुआ देता है।

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।

चील-कौओं की अदालत में है मुज़रिम कोयल
देखिये वक़्त ये अब फ़ैसला क्या देता है।

तू खड़ा हो के कहाँ माँग रहा है रोटी
ये सियासत का नगर सिर्फ़ दग़ा देता है।

मैं किसी बच्चे की मानिन्द सुबह उठता हूँ
जब कोई माँ की तरह मुझको दुआ देता है।

साँस के बोझ से जब रूह तड़प उठती है
वो तेरा प्यार है जो दिल को हवा देता है।

मत उसे ढूँढ़िये शब्दों के नुमायश घर में
हर पपीहा यहाँ 'नीरज' का पता देता है।
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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

शिवओम अम्बर: इन दिनों


राजपुरुषों को रिझाया जा रहा है
राग-दरबारी सुनाया जा रहा है।

बदजुबानों चुप रहो दिल्ली शहर में
इन दिनों उत्सव मनाया जा रहा है।

ये प्रथा है धर्मप्राणों की चिरन्तन
दूध साँपों को पिलाया जा रहा है।

बी सियासत गाँव में मुजरा करेंगी
गीत को घुँघरु बनाया जा रहा है।

चाँदनी चौपाइयाँ जख्मी पड़ी हैं
हर तरफ सच्चाइयाँ जख्मी पड़ी हैं।

ये अन्धेरी अट्टहासों की घड़ी है
मंगला शहनाइयाँ जख्मी पड़ी हैं।

वक्त के सर पे चढ़ी है नागफनियाँ
इन दिनों अमराइयाँ जख्मी पड़ी हैं।

इस तिमिरधर्मा सियासत के शिविर में
धूप की अंगराइयाँ जख्मी पड़ी हैं।
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सोमवार, 4 अप्रैल 2016

डॉ. उर्मिलेश: भूल गये





वो घटायें, वो फुहारें, वो छनक भूल गये,
बच्चे बारिश में नहाने की ललक भूल गये।

ओस कुछ ऐसी पड़ी अबके बरस धरती पर,
लॉन के फूल भी सब अपनी महक भूल गये।

इस कदर प्लास्टिक हावी हुई अपने घर में,
कान, बरसों हुए चूड़ी की खनक भूल गये।

जब से इस बाग में पश्चिम की हवा चल निकली,
तबसे पंछी भी यहाँ अपनी चहक भूल गये।

गाँव के होते हुए जिसको शहर जाना था,
देश के रहनुमा वो ही सड़क भूल गये।

मरकरी बल्बों ने कुछ ऐसा हमें भरमाया,
अब तो हम चाँद-सितारों की चमक भूल गये।

मेरे होंठों की हँसी सबने यहाँ याद रखी,
जाने क्यों लोग मेरे दिल की कसक भूल गये।
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सोमवार, 14 मार्च 2016

डॉ. उर्मिलेश: ख़बर




ये ख़बर भी छापियेगा आज के अख़बार में,
रूह भी बिकने लगी है ज़िस्म के बाज़ार में।

देखकर बच्चों का फ़ैशन वो भी नंगा हो गया,
ये इज़ाफा भी हुआ इस दौर की रफ़्तार में।

आज बस्ती में मचा कुहराम तो उसने कहा,
मौत किसके घर हुई पढ़ लेंगे कल अख़बार में।

अब तो हर त्यौहार का हमको पता चलता है तब,
जब पुलिस की गश्त बढ़ती शहर के बाज़ार में।

मेहमानों, कुछ-न-कुछ लेकर ही जाना तुम वहाँ,
दावतें अब ढल चुकी हैं पूरे कारोबार में।

अपनी शादी पर छपाये उसने अंगरेज़ी में कार्ड,
वो जो हिन्दी बोलता है रोज के व्यवहार में।

वो तड़प, वो चिट्ठियाँ, वो याद, वो बेचैनियाँ,
सब पुराने बाट हैं अब प्यार के व्यापार में।
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