सोमवार, 3 सितंबर 2018

विभांशु दिव्याल- "क्या नाम दें"


 शेष जो कुछ था हरा उसको कुतर खाने लगे
टिड्डियों के दल फ़सल पर फिर नज़र आने लगे।

बढ़ रहे हैं वे मुहल्ले की तरफ लेकर जुलूस
ख़बर क्या फैली घरों में लोग घबराने लगे।

क्या कहें इस सभ्यता के दौर को क्या नाम दें
जो लुटेरे हैं उन्हीं की लोग जय गाने लगे।

इस सियासत में नहीं बहती सुधारों की हवा
आँधियों के घर जिधर हैं हम उधर जाने लगे।

ये सियासत आपकी हमको कभी भायी नहीं
क्या हुआ जो हम इधर से उठ उधर जाने लगे।

आज ही जारी हुई है आपकी अधिसूचना
आज ही आकाश में सब गिद्ध मँडराने लगे।
***
साभार: कलाकृति: बिजन चौधरी

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