सोमवार, 16 जुलाई 2018

राजगोपाल सिंह- "इससे तो बेहतर था"


आजकल हमलोग बच्चों की तरह लड़ने लगे
चाबियों वाले खिलौने की तरह लड़ने लगे।

ठूँठ की मानिन्द अपनी जिन्दगी जीते रहे
जब चली आँधी तो पत्तों की तरह लड़ने लगे।

कौन-सा सत्संग सुनकर आये थे बस्ती के लोग
लौटते ही दो क़बीलों की तरह लड़ने लगे।

हम फ़क़त शतरंज की चालें हैं उनके वास्ते
दी जरा-सी शह तो मोहरों की तरह लड़ने लगे।

इससे तो बेहतर था हम ज़ाहिल ही रह जाते अगर
पढ़ गये, पढ़कर दरिन्दों की तरह लड़ने लगे।
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(Photo courtesy: Sea of hatred by Charles Williams)

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