सोमवार, 14 मार्च 2016

डॉ. उर्मिलेश: ख़बर




ये ख़बर भी छापियेगा आज के अख़बार में,
रूह भी बिकने लगी है ज़िस्म के बाज़ार में।

देखकर बच्चों का फ़ैशन वो भी नंगा हो गया,
ये इज़ाफा भी हुआ इस दौर की रफ़्तार में।

आज बस्ती में मचा कुहराम तो उसने कहा,
मौत किसके घर हुई पढ़ लेंगे कल अख़बार में।

अब तो हर त्यौहार का हमको पता चलता है तब,
जब पुलिस की गश्त बढ़ती शहर के बाज़ार में।

मेहमानों, कुछ-न-कुछ लेकर ही जाना तुम वहाँ,
दावतें अब ढल चुकी हैं पूरे कारोबार में।

अपनी शादी पर छपाये उसने अंगरेज़ी में कार्ड,
वो जो हिन्दी बोलता है रोज के व्यवहार में।

वो तड़प, वो चिट्ठियाँ, वो याद, वो बेचैनियाँ,
सब पुराने बाट हैं अब प्यार के व्यापार में।
*** 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 15/03/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 242 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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